मोबाइल पत्रकारिता गाइड: रिपोर्टिंग के लिए वरदान ‘मोजो’
|
मोबाइल पत्रकारिता इस दौर की रिपोर्टिंग में बहुत उपयोगी साबित हुई है। इसको करना आसान है और इस युग में हर दिन आने वाले नए संसाधनों ने इसे और भी आसान कर दिया है ।
Global Investigative Journalism Network (https://archive.gijn.org/category/hindi/page/13/)
मोबाइल पत्रकारिता इस दौर की रिपोर्टिंग में बहुत उपयोगी साबित हुई है। इसको करना आसान है और इस युग में हर दिन आने वाले नए संसाधनों ने इसे और भी आसान कर दिया है ।
भारत के बाद ब्राजील दूसरा ऐसा देश हैं जहां लोग व्हाट्सएप का सबसे ज्यादा उपयोग करते हैं। एक अनुमान के मुताबिक ब्राजील में व्हाट्सएप के 99 मिलियन मासिक यूजर हैं। वहीं एक अन्य अनुमान के मुताबिक ब्राजील में व्हाटसएप के 120 मिलियन यूजर हैं। इस वजह से व्हाट्सएप का उपयोग करके कोरियो राष्ट्रीय ट्रेंड को फॉलो कर रहा है। ब्राजील के अलावा भी देखें तो कई शोध हैं जो यह बताते हैं कि लतिन अमेरिका और अफ्रीका के लोगों द्वारा व्हाट्सएप का अधिक उपयोग किया जाता है। यह छोटे न्यूज रूम को अपनी खबरें लोगों तक पहुंचाने में मदद करता है और नए अवसर देता है।
दुुनिया भर में दिख रही प्रवृतियां बताती हैं कि पत्रकारों पर पहले की तुलना में बढ़ते खतरों पर विचार करना जरूरी है। इनमें शारीरिक हिंसा, मानसिक उत्पीड़न, व्यक्तिगत सूचनाओं को उजागर करना, डिजिटल सुरक्षा का उल्लंघन और पत्रकारों की तस्वीरों में हेरफेर करके फर्जीवाड़ा करना शामिल है। ऐसी चीजें पत्रकारों के जीवन को भी खतरे में डालती हैं। इसके कारण उनकी स्वतंत्र अभिव्यक्ति सीमित हो सकती है। यहां तक कि उन्हें मीडिया का पेशा छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है। जिस तरह ऑनलाइन जगत में सच पर हमला हो रहा है, वैसे ही पत्रकार भी निशाने पर हैं। इसलिए उन्हें अपनी डिजिटल सुरक्षा के बारे में गंभीरता से सोचना चाहिए।
मीडिया की स्वतंत्रता महज लोकतांत्रिक व्यवस्था को ही नहीं बल्कि देश की अर्थव्यवस्था को भी गति देती है। यह बात सुनने में अटपटी लग सकती है, लेकिन अब यह प्रमाणित हो रहा है कि मीडिया की स्वतंत्रता से भी अर्थव्यवस्था का सीधा सम्बन्ध है। हमारे शोध में इस बात के प्रमाण मिले हैं कि प्रेस की स्वतंत्रता पर हमले, जैसे पत्रकारों को जेल में डालना, घरों पर छापा मारना, प्रिंटिंग प्रेस को बंद करना, या डराने-धमकाने के लिए मानहानि के मुकदमे दायर करना आदि आर्थिक विकास पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालते हैं।
स्थानीय समाचार पत्रों, रेडियो, टीवी स्टेशनों, तथा अन्य स्थानीय मीडिया संस्थानों को सार्वजनिक रिकॉर्ड का एक भरोसेमंद स्रोत माना जाता है। इन पर दुनिया भर के नागरिक भरोसा करते हैं। लेकिन आज जब मीडिया संस्थानों को अस्तित्व के संकट से जूझना पड़ रहा है, तो ऐसे सार्वजनिक रिकॉर्ड का संरक्षण जरूरी है। अगर वह रिकॉर्ड हमसे छिन जाए, तो क्या होगा? उन सूचनाओं के महत्वपूर्ण हिस्से और डिजिटल सामग्री खो जाए तो क्या होगा? अगर इन्हें मिटा दिया जाए, या प्रौद्योगिकी की मशीनरी द्वारा नष्ट हो जाए, तो भावी पीढ़ियों को इतिहास का पता कैसे चलेगा?
किसी विशेष क्षेत्र से जुड़ी खबर या आलेख के लिए उस विषय के जानकार विशेषज्ञ स्रोत तक पहुंचना जरूरी होता है। क्या आपको किसी खबर या आलेख के लिए किसी विशेषज्ञ स्रोत की तलाश है?
रेडियो एक ऐसा माध्यम है, जिसमें हम कोई ‘दृश्य‘ नहीं दिखा सकते हैं। ऑडियो स्क्रिप्ट में आंकड़ों और संख्याओं के उपयोग को भी प्रारंभ से ही अनुचित समझा जाता है। इसके कारण डेटा के मामलों में अन्य मीडिया प्रारूपों की तुलना में रेडियो पत्रकारिता को सीमित समझा जाता है। हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि नए उपकरण और तकनीक के जरिए रेडियो पत्रकार अपनी खबरों को बेहतर बना सकते हैं। वे अपनी ऑडियो स्टोरीज के डिजिटल संस्करणों में डेटा का समुचित उपयोग कर सकते हैं।
फ्रीलांसरों के पास काफी पत्रकारीय स्वतंत्रता होती है, और दुनिया भर में स्वतंत्र पत्रकारों का एक समृद्ध इतिहास है। लेकिन उन्हें अपनी हर खबर या आलेख के एवज में समुचित मानदेय मिलना आवश्यक है, क्योंकि उनका काम अन्य सभी मीडिया प्रोफेशन की अपेक्षा ज्यादा मुश्किल है।
डिजिटल उपकरणों का उपयोग करके हरेक सामग्री को सत्यापित करने की भी एक सीमा है। हर मामले में एल्गोरिदम कारगर हो, ऐसा जरूरी नहीं। कोई चाहे तो एल्गोरिदम को झांसा देने वाले तरीकों का उपयोग करके फर्जी सामग्री अपलोड कर सकता है। ऐसे लोग ‘रिवर्स इमेज सर्च‘ से बचने के लिए कुछ ट्रिक्स का इस्तेमाल करते हैं। जैसे, वीडियो मिरर करना, कलर स्कीम को ब्लैक एंड व्हाइट में बदलना, जूम इन या आउट करना इत्यादि। इसके लिए जांच का सबसे अच्छा तरीका यह है कि वीडियो के हर पहलू पर गौर करें। उसे जिस तरह की घटना बताया जा रहा है, उसके साथ वीडियो के हर पहलू का कितना तालमेल है? वीडियो उस कथित घटना के अनुरूप है अथवा नहीं?
इस आलेख में अपनी खबर को पिच करना या बिक्री करने से अभिप्राय उसे प्रकाशित, प्रसारित करने के लिए मीडिया संस्थान को सहमत कराना है। किसी भी खोजी खबर को लिखने और उसके शोध तथा यात्रा इत्यादि में काफी समय और पैसा लगता है। इस व्यय के लिए मीडिया संस्थान को सहमत कराने की कोशिश पर यह आलेख केंद्रित है।